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दुर्मिल सवैया

दुर्मिल सवैया

(दुर्मिल सवैया)

(8सगण = 112×8)

शुभ पुस्तक हस्त सदा सजती, कमलासन श्वेत बिराजत है।
मुख मण्डल तेज सुशोभित है, वर वीण सदा कर साजत है।
नर-नार बसन्तिय पंचम को, सब शारद पूजत ध्यावत है।
तुम हंस सुशोभित हो कर माँ, प्रगटो वर सेवक माँगत है।।

बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’